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India-China Border Trade : शिपकी ला में आज भी सामान के बदले सामान, 1697 की परंपरा कायम; जानें इसके बारे में
Mon, 03 Aug 2026 10:25 AM IST
Ankesh Dogra
प्रकाश ठाकुर/रामपुर बुशहर।
प्रकाश ठाकुर/रामपुर बुशहर।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Mon, 03 Aug 2026 10:25 AM IST
सार
किन्नौर के शिपकी ला में भारत-चीन सीमा व्यापार आज भी 1697 की वस्तु विनिमय संधि के तहत संचालित हो रहा है। यहां नकद या डिजिटल भुगतान के बजाय सामान के बदले सामान का लेनदेन किया जाता है। छह साल बाद दोबारा शुरू हुए इस व्यापार में केवल सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत व्यापारी हिस्सा ले रहे हैं। कारोबारी सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना है।
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कारोबार के लिए जाते व्यापारियों के दस्तावेज देखते सेना के जवान।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
आज दुनिया नकद से डिजिटल भुगतान तक पहुंच चुकी है, लेकिन भारत-चीन सीमा पर किन्नौर के शिपकी ला में सदियों पुरानी वस्तु विनिमय प्रणाली आज भी जारी है। छह साल बाद फिर शुरू हुए सीमा व्यापार में यहां न नकद चलता है, न ऑनलाइन भुगतान। 1697 में तिब्बत और बुशहर रियासत के बीच हुई संधि के अनुसार आज भी सामान के बदले सामान का लेनदेन होता है।
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शनिवार को शिपकी ला मार्ग, उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथू ला मार्ग से चीन के साथ कारोबार छह साल बाद शुरू हुआ। शिपकी ला मार्ग से होने वाला कारोबार अन्य दोनों मार्गों से अलग है। इस मार्ग से होने वाले कारोबार में आज भी वस्तुओं का आदान-प्रदान होता है। इस अनूठी परंपरा की नींव वर्ष 1697 में पड़ी थी, जब तिब्बत और तत्कालीन बुशहर रियासत के राजा केहरी सिंह के बीच विनियमित वस्तु विनिमय व्यापार संधि हुई। खास बात यह है कि यह समझौता किसी लिखित दस्तावेज के बजाय पारंपरिक लोक शपथ ‘गामग्या’ और आपसी विश्वास पर आधारित था।
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तीन सदी से अधिक समय बीतने के बाद भी सीमा व्यापार उसी परंपरा और नियमों के अनुसार जारी है। यह विनियमित वस्तु विनिमय व्यापार संधि में ऊपरी किन्नौर के सीमावर्ती गांवों, जिनमें नामगिया, चुप्पन, नाको, पूह और चांगो शामिल हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस मार्ग से कारोबार को बंद किया गया था।
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बाद में द्विपक्षीय प्रोटोकॉल के तहत 1992-1994 में इसे दोबारा शुरू किया गया। आंकड़ों के अनुसार व्यापार में भागीदारी में उतार-चढ़ाव भी आया है। साल 2015 में 71 भारतीय व्यापारी, 2016 में 75, 2017 में 34, 2018 में 37 और 2019 में 45 व्यापारियों ने सीमा पार की। सबसे अधिक व्यापार 1994 में हुआ, जब 90 व्यापारियों ने भाग लिया।
कारोबारी सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना
सरकार ने आयात और निर्यात के लिए चुनिंदा वस्तुओं की सूची तय की है। इस कारोबार में उन्हीं वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाएगा। यह व्यापार इस बार पुह उपमंडल के सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत स्थानीय व्यापारियों के लिए है। इस बार कारोबारी सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना है। - भीम सिंह, शिपकी ला ट्रेड ऑफिसर
सरकार ने आयात और निर्यात के लिए चुनिंदा वस्तुओं की सूची तय की है। इस कारोबार में उन्हीं वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाएगा। यह व्यापार इस बार पुह उपमंडल के सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत स्थानीय व्यापारियों के लिए है। इस बार कारोबारी सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना है। - भीम सिंह, शिपकी ला ट्रेड ऑफिसर
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है?
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) वह व्यवस्था है जिसमें पैसे का उपयोग किए बिना एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु या सेवा का आदान-प्रदान किया जाता है।
आसान उदाहरण:
एक किसान 10 किलो गेहूं देकर बदले में 5 किलो चावल लेता है।
कोई व्यक्ति ऊन देकर बदले में नमक या सूखे मेवे लेता है।
यानी सामान के बदले सामान का लेनदेन ही वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है।
शिपकी ला में कैसे होती है?
किन्नौर के शिपकी ला सीमा व्यापार में आज भी यही परंपरा लागू है। यहां भारत और तिब्बत (चीन) के पंजीकृत व्यापारी सरकार द्वारा अनुमोदित वस्तुओं का नकद या डिजिटल भुगतान के बजाय वस्तुओं के बदले वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं। यह व्यवस्था 1697 की पारंपरिक संधि और आपसी विश्वास पर आधारित मानी जाती है।
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) वह व्यवस्था है जिसमें पैसे का उपयोग किए बिना एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु या सेवा का आदान-प्रदान किया जाता है।
आसान उदाहरण:
एक किसान 10 किलो गेहूं देकर बदले में 5 किलो चावल लेता है।
कोई व्यक्ति ऊन देकर बदले में नमक या सूखे मेवे लेता है।
यानी सामान के बदले सामान का लेनदेन ही वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है।
शिपकी ला में कैसे होती है?
किन्नौर के शिपकी ला सीमा व्यापार में आज भी यही परंपरा लागू है। यहां भारत और तिब्बत (चीन) के पंजीकृत व्यापारी सरकार द्वारा अनुमोदित वस्तुओं का नकद या डिजिटल भुगतान के बजाय वस्तुओं के बदले वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं। यह व्यवस्था 1697 की पारंपरिक संधि और आपसी विश्वास पर आधारित मानी जाती है।